गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

आग लगाऊ दिग्विजय सिंह की सभाओं में सरकार भेजती है फायर ब्रिगेड

आग लगाऊ दिग्विजय सिंह की सभाओं में सरकार भेजती है फायर ब्रिगेड

चुनाव चर्चा-3

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

आज के अखबारों में खबर छपी है हालांकि खबर का शीर्षक तो दुखद है लेकिन खबर के भीतर जो खबर है वह काफी हैरत अंगेज है, कम से कम मैं तो इसे पढ़ कर चौंक ही गया । खबर भिण्‍ड जिले के एक गॉंव के बारे में हैं, कल भिण्‍ड जिला में एक गॉंव आग लग गई तकरीबन 20 घर पूरी तरह जल कर खाक हो गये, सरकारी आकलन के मुताबिक 15 लाख का माल मशरूका जल कर भस्‍म हो गया ।

वैसे तो इन गर्मी के दिनों में एक तो विकट गर्मी के कारण हर चीज सूख कर ईंधन बन जाती है ऊपर से गर्म हवा की लपटों से जरा सी चिंगारी भी विकराल रूप धारण कर लेती है । हर साल अकेली चम्‍बल ही गर्मीयों में करीब 1 से 7-8 करोड़ रू का नुकसान आग से झेलती है । कई वजह से आग लगती है, कभी बिजली के शॉर्ट सर्किट से तो कभी सिगरेट बीड़ी के ठूंठ से तो कभी चूल्‍हे या बरोसी से उड़े तिलंगों से । चिंगारी से भड़कने वाली यह आग कभी ज्‍वाला बन जाती है तो कभी समूचे गॉंव या खेत खलिहान को भस्‍म कर डालती है । मैं जब छोटा सा था तब से अब तक यह आग देखता आ रहा हूँ हर साल लगती है और सैकड़ों किसानों ( कई जगह के ग्रामीण तो भूमिहीन होकर केवल पशुपालन या अन्‍य लोगों के खेतों में मजदूरी पर ही आश्रित हैं) व ग्रामीणों का सब अन्‍न दाना , कपड़ा लत्‍ता सब लील जाती है । मुझे लगता था कि मैं कुछ बना तो जरूर गरीब ग्रामीणों की इस समस्‍या के लिये कुछ न कुछ करूंगा । खैर चलो हम तो बन नहीं पाये लेकिन जो लोग बने उन्‍होंने कभी गरीब ग्रामीणों के इस आपत्ति काल व आकस्मिक समस्‍याओं के बारे में कभी नहीं सोचा, उन्‍हें अपनी वी.आई.पी. जिन्‍दगी से नीचे इस आम जिन्‍दगी की ओर झांकने का मौका तक नहीं मिला ।

किसी नेता या पत्रकार के लिये एक गॉंव का आग में स्‍वाहा हो जाना या लाखों करोड़ों का नुकसान हो जाना महज एक समाचार हो सकता है लेकिन एक गरीब किसान या ग्रामीण जो कि साल भर की पूरी मेहनत के साथ अपने पूरे घर गॉंव को जल कर भस्‍म होते देखता है, तो उसकी ऑंखों के ऑंसू थमने का नाम नहीं लेते और चन्‍द पलों के भीतर वह राजा से रंक हो जाता है । और मालिक से मजदूर बन जाता है, साल भर के पेट पालन के लिये न जाने क्‍या क्‍या बेचने और गिरवी धरने पर मजबूर हो जाता है । यहॉं तक कि बहू बेटियों की अस्‍मत भी । किसी नेता या किसी पार्टी ने हर साल गरीब ग्रामीणों पर आने वाली इस तयशुदा विपदा के लिये न कभी डायजास्‍टर मैनेजमेण्‍ट चलाया न इसके लिये कोई राहत कोष ही कभी स्‍थापित किया ।

किसान आयोग बनाने और खेती किसानी को मुनाफे को धन्‍धा बनाने या उद्योग का दर्जा देने की बात करने वाले सब इस मुद्दे से अनजान, बेपरवाह और खामोश है । किसान का घर जलना तो जैसे आम बात है , उफ शर्म शर्म शर्म ....

मुझे लोगों के लॉंक (फसल का ढेर गॉंवों में लॉंक कहा जाता है) के साथ साल, रोजी रोटी और सपनों को जिन्‍दा जलते देखने का अवसर कई बार मिला है । मुझे तकलीफ होती है । हर खबर जैसे मुझे झिंझोड़ देती है ।

आज भिण्‍ड के बारे में खबर अखबारों में आयी तो तकलीफ हुयी, भिण्‍ड से मेरा बहुत पुराना गहरा नाता है, पूरी प्रायमरी तक पढ़ाई लिखाई मुझे भिण्‍ड में ही नसीब हुयी वहीं सन्‍त कुमार लोहिया जैसा आदर्श गुरूओं की शिष्‍यता मुझे प्राप्‍त हुयी उनके आशीर्वाद और वरद हस्‍त ने मुझे ज्ञान और विवेक से परिचित कराया, राकेश पाठक (नई दुनिया के सम्‍पादक) प्रवीर सचान (इसरो के वैज्ञानिक) से लेकर विदेशों में सेवायें दे रहे बड़े बड़े वैज्ञानिक और इंजीनियर भारत की उच्‍च स्‍तरीय सेवाओं में पदस्‍थ कई अनमोल मित्र भी मुझे भिण्‍ड से ही मिले । आगे चल कर ससुराल भी भिण्‍ड ही बन गयी । संयोगवश लोकसभा चुनाव भी मैंने भिण्‍ड से ही लड़ा ।

भिण्‍ड में डॉं रामलखन सिंह (वर्तमान सिटिंग सांसद) के विरूद्ध मुझे लोकसभा का चुनाव लड़ने का मौका किला, उनका भी सांसदी का वह पहला चुनाव था मेरा भी यह पहला अवसर था । फर्क यह था कि वे भाजपा के बैनर पर थे हम पैदल थे । बाद में आगे चलकर डॉ. रामलखन सिंह भी हमारे रिश्‍तेदार बन गये ।

डॉं. रामलखन सिंह के हवाले से अखबारों में छपा है कि गॉंव में आग लगने की खबर उन्‍होंने प्रशासन को दी लेकिन प्रशासन ने कहा कि फायर ब्रिगेड उपलब्‍ध नहीं हैं, भिण्‍ड जिला में म.प्र. के पूर्व मुख्‍यमंत्री औंर कॉंग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की सभायें हो रहीं हैं सो फायर ब्रिगेड दिग्विजय सिंह की सभाओं में गयीं हैं ।

मुझे इस खबर से झन्‍नाटा लगना था सो लगा । दिग्विजय सिंह की सभाओं में फायरब्रिगेड भेजना मुझे कुछ अजीबो गरीब सा लगा । या तो हमारे डॉं. साहब झूठ बोल रहे हैं सरासर झूठ या फिर यह सच है तो हैरत अंगेज है ।

क्‍या दिग्विजय सिंह उमा भारती की तरह फायर ब्राण्‍ड नेता हैं जो आग लगाते फिरते हैं, सो सरकार को उनके संग हर सभा में फायर ब्रिगेड भेजनी पड़ती है ।

खैर भाजपाई सोच सकते हैं सोचो सोचो ...गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है । यूं सोचो कि दिग्विजय सिंह जहॉं जाते हैं वहीं आग लगा आते हैं, जिसे बुझाने के लिये भाजपाईयों को दिन रात एक करके हफ्तों तक पसीना बहा कर पानी छिड़कना पड़ता है । और राजा हैं कि मानते ही नहीं, छेड़ना, ऊंगली करना, आग लगाना, खिला खिला कर मारना ये सब दिग्विजय सिंह की बहुत पुरानी आदतें हैं । और तो और आदमी एक बार आग लगा कर भाग जाये तो भी बात बने मगर दिक्‍कत ये है कि राजा रोज आ धमकते हैं और हनुमान जी जैसी पूंछ पसार कर कभी यहॉं तो कभी वहॉं आग लगा देते हैं, कहॉं कहॉं बुझायें कैसे कैसे बुझायें वाकई टेंशन है । भाजपा के लिये दिग्यिजय सिंह आग लगाऊ मशीन बन गये हैं । ज‍हॉं जाते हैं वहीं गड़बड़ कर देते हैं ।

लगता है भाजपा ने राजा का तोड़ खोज लिया है, इसलिये दिग्विजय सिंह की हर सभा में फायर ब्रिगेड भेजना शुरू कर दी है । अब भईया किसी गॉंव शहर में कहीं आग लगे तो फायर ब्रिगेड के बजाय राजा दिग्विजय सिंह को फोन लगायें जिससे कम से कम फायर ब्रिगेड तो पहुँच जायेगी । मैं तो कहता हूँ कि फोन डायरेक्‍ट्री में फायर ब्रिगेड का नंबर बदल कर राजा साहब का नंबर छाप देना चाहिये । अब भईया मेरे तो राजा साहब से भी अच्‍छे ताल्‍लुक हैं, उनके साथ काम करने का मौका भी मिला है, कभी मौका मिला तो उन्‍हें चिट्ठी लिखकर अवगत करा दूंगा कि अपना नंबर फायर ब्रिगेड में छपवा दीजिये । वैसे तो इस आलेख को वे इण्‍टरनेट पर वे पढ़ ही लेंगें उनके साथ और भी कई हाईप्रोफाइल पढ़ कर उनका नंबर फायर ब्रिगेड में डलवा ही देंगें ।

सिर उठाने लगा राजस्‍थान का मीणा गूजर मुद्दा

राजस्‍थान के गूजर मीणा संग्राम से लगभग सभी भारतवासी अवगत ही हैं, मुरैना से कांग्रेस प्रत्‍याशी रामनिवास रावत भी जाति से मीणा हैं । आज रावत ने अपनी मदद के लिये राजस्‍थान से नमो नारायण मीणा को बुलवाया हैं । उधर रावत के मीणा वाद से मुरैना के गूजर नेता भड़क गये हैं, गूजर वोटो पर अब तक आस टिकाये रामनिवास के लिये चम्‍बल के गूजर समुदाय से खतरे की घण्‍टी बजने लगी है । और रही सही गूजर वोट की आस भी जाती खिसकती नजर आने लगी है ।

गूजर पहले से ही कांग्रेस द्वारा मीणा (राम निवास रावत) को यहॉं टिकिट देने से खफा चल रहे थे अब खुल कर बोलने भी लगे हैं । हालांकि राजस्‍थान मुद्दे की बात गूजर केवल अपनी जाति समुदाय के बीच करते हैं लेकिन आम जनता में बड़ा अलग ही तर्क दे रहे हैं, उनका तर्क है कि मुरैना सामान्‍य सीट है या आरक्षित, अगर आदिवासी (चम्‍बल के गूजर चम्‍बल के मीणाओं को आदिवासी कहते हैं)  ही वोट देना है तो फिर इस सीट को समान्‍य कराने की जरूरत क्‍या थी ।

मैं गूजरों के ऐसे ओछे तर्कों से सहमत नहीं हूँ भई चम्‍बल में मीणा आदिवासी नहीं बल्कि पिछड़े वर्ग में आते हैं, राजस्‍थान की बात राजस्‍थान तक ही रहने दीजिये, और रामनिवास को भी राजस्‍थान से जातिवादी नेता इम्‍पोर्ट नहीं करना चाहिये थे ।

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड – गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

चुनाव चर्चा-2

जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं प्रचार भी अपनी जवानी पर आता जा रहा है । जहॉं तक ग्‍वालियर चम्‍बल की बात है अंचल की चारों सीटों पर परिणाम तकरीबन साफ और परिदृश्‍य एकदम स्‍पष्‍ट दीवार पर लिखी इबारत के मानिन्‍द सुपाठ्य है ।

भिण्‍ड संसदीय सीट पर जहॉं कांग्रेस उम्‍मीदवार डॉ. भागीरथ भारी भरकम विजय परचम फहराने जाते दीख रहे हैं तो वहीं बिल्‍कुल ऐसा ही मुरैना सीट पर विकट जातीय ध्रुवीकरण के चलते भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर भी ऐतिहासिक जीत (रिकार्ड मतों के साथ) अंकित करने जा रहे हैं । मेरे विश्‍लेषण और आकलन के मुताबिक इन दोनों ही सीटों पर चुनाव लगभग एक चक्षीय से हो गये हैं । मुरैना में हालांकि जातीय और सामाजिक माहौल भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर के एकदम खिलाफ था और अंचल के मतदाता तोमर से एकदम खफा थे लेकिन जातीय ध्रुवीकरण (जो कि होना ही था) और एकमात्र दलीय राजपूत प्रत्‍याशी होने का लाभ न केवल नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहा है अपितु मजबूरी में मिले वोट ( लोगों का कहना है क्‍या करें मजबूरी में वोट देना पड़ रहा है ) भी रिकार्ड होंगें तथा यह भी कि इसमें केवल राजपूत वोट ही नहीं बल्कि अन्‍य तकरीबन सभी जातियों के वोट भी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहे हैं (सभी वोट मजबूरी के वोट हैं) ।

भिण्‍ड में भी ऐसे ही हालात हैं लेकिन एकदम उल्‍टे यानि यहॉं इस संसदीय सीट पर कॉंग्रेस की यही स्थिति है ( यहॉं मजबूरी का वोट नहीं बल्कि मनपसन्‍द प्रत्‍याशी के लिये वोट होगा) । गोहद विधायक स्‍व. माखन लाल जाटव की हत्‍या के बाद डॉ भागीरथ की जीत पुख्‍ता और पुष्‍ट हो गयी है, यह जीत तो हत्‍या से पहले ही लगभग एकदम सुनिश्चित थी । भिण्‍ड सीट पर भाजपा चुनाव प्रचार की शुरूआत से ही प्रभावहीन थी । ऊपर से माखन लाल जाटव की हत्‍या से भाजपा का चुनाव प्रचार एकदम कोमा में पहुँच गया है और भाजपाई डरते दुबकते चुनाव की बात करते हैं । बचे खुचे भाजपा कार्यकर्ता मुरैना और गुना पलायन कर गये हैं ।

अशोक अर्गल (भाजपा प्रत्‍याशी) को जो जिल्‍लत भिण्‍ड में उठानी पड़ रही है वह स्‍वाभाविक ही थी, चम्‍बल की इन दोनों सीटों पर जो भी हो रहा है उसमें किंचित भी कुछ भी विस्‍मयकारी नहीं है ।

गुना ग्‍वालियर में सीधे मुकाबले भाजपा और कांग्रेस के बीच हैं और ग्‍वालियर में मामूली (अधिक भी संभव है)  अन्‍तराल पर कांग्रेस तथा गुना में लम्‍बे अन्‍तराल पर कांग्रेस का विजयी होना लगभग तय माना जा रहा है ।

मुरैना में सीधा मुकाबला भाजपा बसपा के बीच होगा , कांग्रेस और माकपा तीसरे व चौथे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगे । भिण्‍ड में त्रिकोणीय कहिये या एक पक्षीय कहिये कांग्रेस की विजय के साथ भाजपा और बसपा दूसरे व तीसरे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगीं । मुरैना में हालांकि भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को बड़ी आसानी से हराया जा सकता है लेकिन प्रतिद्वंदी प्रत्‍याशी इसका लाभ नहीं उठा पा रहे । अव्‍वल तो नरेन्‍द्र सिंह तोमर के कमजोर पक्ष (वीक पाइण्‍टस) से वे पूरी तरह या तो अज्ञान या अनजान हैं या फिर उठा नहीं पा रहे या उठाना नहीं चाह रहे । अन्‍य प्रत्‍याशीयों की तुलना नरेन्‍द्र सिंह तोमर का नकारात्‍मक पक्ष अधिक स्‍पष्‍ट व प्रबल था लेकिन यह नरेन्‍द्र सिंह तोमर का भाग्‍य या मुकद्दर है कि उनकी टक्‍कर में कांग्रेस और बसपा ताकतवर प्रत्‍याशी न देकर कमजोर प्रत्‍याशीयों को लेकर आयीं जो कि चुनाव प्रचार की सामान्‍य और बारीक कैसी भी रणनीति और रीति नीति से सर्वथा नावाकिफ हैं ।

मुरैना 23 करोड़ और विदिशा 37 करोड़ में बिके

मुरैना में हालांकि यह अफवाह भी है कि कांग्रेस ने मुरैना और विदिशा सीट क्रमश: 23 करोड़ और 37 करोड़ रू. में भाजपा को बेची हैं । अब इस अफवाह में कितनी दम है या कितनी सच्‍चाई है यह तो भाजपाई जानें या कांग्रेसी बन्‍धु जानें ।

पार्टीयां बेअसर

भिण्‍ड और मुरैना तथा गुना और ग्‍वालियर चारों सीटों पर राजनीतिक पार्टीयां पूरी तरह बेअसर हो गयीं है इन सीटों पर प्रत्‍याशी की व्‍यक्तिगत छवि और जातीय ध्रुवीकरण एवं सामाजिक समीकरणों पर चुनाव आध्‍धरित हो गये हैं ।  

माखनलाल हत्‍याकाण्‍ड- डेमेज कण्‍ट्रोल बेअसर

भाजपा और पुलिस द्वारा गोहद विधायक माखन लाल जाटव की हत्‍या से बनी स्थिति और हुये डेमेज के कण्‍ट्रोल के लिये खेले गये सर्कस और सीरीयल चुनावी अर्थों में बेअसर हो गये हैं । हत्‍याकाण्‍ड में कांग्रेसी नेताओं को लपेटना लोगों के गले नहीं उतर रहा जबकि हत्‍या की सुपारी के लिये पैसे कहॉं से आये किसने दिये, किसको दिये कब दिये कहॉं दिये जैसे सवाल अभी तक अधर में हैं, पैसे बरामद क्‍यों नहीं हुये, कई सवाल पुलिस की भूमिका और भाजपा नेताओं पर सवालिया निशान लगा रहे हैं । इसमें एक अहम सवाल यह भी है कि जो व्‍यक्ति 32 लाख रू. की सुपारी लेकर हत्‍या कर सकता है, क्‍या वही व्‍यक्ति ज्‍यादा रकम मिलने पर झूठा गुनाह नहीं कबूल कर सकता ( संभव है कि झूठा गुनाह कबूल करने के लिये भी पैसे मिले हों) अभी सवाल कई इस हत्‍याकाण्‍ड पर उठ रहे हैं और पुलिस की भूमिका दिनोंदिन संदिग्‍ध ही होती जा रही है ।          

 

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड – गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

चुनाव चर्चा-2

जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं प्रचार भी अपनी जवानी पर आता जा रहा है । जहॉं तक ग्‍वालियर चम्‍बल की बात है अंचल की चारों सीटों पर परिणाम तकरीबन साफ और परिदृश्‍य एकदम स्‍पष्‍ट दीवार पर लिखी इबारत के मानिन्‍द सुपाठ्य है ।

भिण्‍ड संसदीय सीट पर जहॉं कांग्रेस उम्‍मीदवार डॉ. भागीरथ भारी भरकम विजय परचम फहराने जाते दीख रहे हैं तो वहीं बिल्‍कुल ऐसा ही मुरैना सीट पर विकट जातीय ध्रुवीकरण के चलते भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर भी ऐतिहासिक जीत (रिकार्ड मतों के साथ) अंकित करने जा रहे हैं । मेरे विश्‍लेषण और आकलन के मुताबिक इन दोनों ही सीटों पर चुनाव लगभग एक चक्षीय से हो गये हैं । मुरैना में हालांकि जातीय और सामाजिक माहौल भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर के एकदम खिलाफ था और अंचल के मतदाता तोमर से एकदम खफा थे लेकिन जातीय ध्रुवीकरण (जो कि होना ही था) और एकमात्र दलीय राजपूत प्रत्‍याशी होने का लाभ न केवल नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहा है अपितु मजबूरी में मिले वोट ( लोगों का कहना है क्‍या करें मजबूरी में वोट देना पड़ रहा है ) भी रिकार्ड होंगें तथा यह भी कि इसमें केवल राजपूत वोट ही नहीं बल्कि अन्‍य तकरीबन सभी जातियों के वोट भी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहे हैं (सभी वोट मजबूरी के वोट हैं) ।

भिण्‍ड में भी ऐसे ही हालात हैं लेकिन एकदम उल्‍टे यानि यहॉं इस संसदीय सीट पर कॉंग्रेस की यही स्थिति है ( यहॉं मजबूरी का वोट नहीं बल्कि मनपसन्‍द प्रत्‍याशी के लिये वोट होगा) । गोहद विधायक स्‍व. माखन लाल जाटव की हत्‍या के बाद डॉ भागीरथ की जीत पुख्‍ता और पुष्‍ट हो गयी है, यह जीत तो हत्‍या से पहले ही लगभग एकदम सुनिश्चित थी । भिण्‍ड सीट पर भाजपा चुनाव प्रचार की शुरूआत से ही प्रभावहीन थी । ऊपर से माखन लाल जाटव की हत्‍या से भाजपा का चुनाव प्रचार एकदम कोमा में पहुँच गया है और भाजपाई डरते दुबकते चुनाव की बात करते हैं । बचे खुचे भाजपा कार्यकर्ता मुरैना और गुना पलायन कर गये हैं ।

अशोक अर्गल (भाजपा प्रत्‍याशी) को जो जिल्‍लत भिण्‍ड में उठानी पड़ रही है वह स्‍वाभाविक ही थी, चम्‍बल की इन दोनों सीटों पर जो भी हो रहा है उसमें किंचित भी कुछ भी विस्‍मयकारी नहीं है ।

गुना ग्‍वालियर में सीधे मुकाबले भाजपा और कांग्रेस के बीच हैं और ग्‍वालियर में मामूली (अधिक भी संभव है)  अन्‍तराल पर कांग्रेस तथा गुना में लम्‍बे अन्‍तराल पर कांग्रेस का विजयी होना लगभग तय माना जा रहा है ।

मुरैना में सीधा मुकाबला भाजपा बसपा के बीच होगा , कांग्रेस और माकपा तीसरे व चौथे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगे । भिण्‍ड में त्रिकोणीय कहिये या एक पक्षीय कहिये कांग्रेस की विजय के साथ भाजपा और बसपा दूसरे व तीसरे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगीं । मुरैना में हालांकि भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को बड़ी आसानी से हराया जा सकता है लेकिन प्रतिद्वंदी प्रत्‍याशी इसका लाभ नहीं उठा पा रहे । अव्‍वल तो नरेन्‍द्र सिंह तोमर के कमजोर पक्ष (वीक पाइण्‍टस) से वे पूरी तरह या तो अज्ञान या अनजान हैं या फिर उठा नहीं पा रहे या उठाना नहीं चाह रहे । अन्‍य प्रत्‍याशीयों की तुलना नरेन्‍द्र सिंह तोमर का नकारात्‍मक पक्ष अधिक स्‍पष्‍ट व प्रबल था लेकिन यह नरेन्‍द्र सिंह तोमर का भाग्‍य या मुकद्दर है कि उनकी टक्‍कर में कांग्रेस और बसपा ताकतवर प्रत्‍याशी न देकर कमजोर प्रत्‍याशीयों को लेकर आयीं जो कि चुनाव प्रचार की सामान्‍य और बारीक कैसी भी रणनीति और रीति नीति से सर्वथा नावाकिफ हैं ।

मुरैना 23 करोड़ और विदिशा 37 करोड़ में बिके

मुरैना में हालांकि यह अफवाह भी है कि कांग्रेस ने मुरैना और विदिशा सीट क्रमश: 23 करोड़ और 37 करोड़ रू. में भाजपा को बेची हैं । अब इस अफवाह में कितनी दम है या कितनी सच्‍चाई है यह तो भाजपाई जानें या कांग्रेसी बन्‍धु जानें ।

पार्टीयां बेअसर

भिण्‍ड और मुरैना तथा गुना और ग्‍वालियर चारों सीटों पर राजनीतिक पार्टीयां पूरी तरह बेअसर हो गयीं है इन सीटों पर प्रत्‍याशी की व्‍यक्तिगत छवि और जातीय ध्रुवीकरण एवं सामाजिक समीकरणों पर चुनाव आध्‍धरित हो गये हैं ।  

माखनलाल हत्‍याकाण्‍ड- डेमेज कण्‍ट्रोल बेअसर

भाजपा और पुलिस द्वारा गोहद विधायक माखन लाल जाटव की हत्‍या से बनी स्थिति और हुये डेमेज के कण्‍ट्रोल के लिये खेले गये सर्कस और सीरीयल चुनावी अर्थों में बेअसर हो गये हैं । हत्‍याकाण्‍ड में कांग्रेसी नेताओं को लपेटना लोगों के गले नहीं उतर रहा जबकि हत्‍या की सुपारी के लिये पैसे कहॉं से आये किसने दिये, किसको दिये कब दिये कहॉं दिये जैसे सवाल अभी तक अधर में हैं, पैसे बरामद क्‍यों नहीं हुये, कई सवाल पुलिस की भूमिका और भाजपा नेताओं पर सवालिया निशान लगा रहे हैं । इसमें एक अहम सवाल यह भी है कि जो व्‍यक्ति 32 लाख रू. की सुपारी लेकर हत्‍या कर सकता है, क्‍या वही व्‍यक्ति ज्‍यादा रकम मिलने पर झूठा गुनाह नहीं कबूल कर सकता ( संभव है कि झूठा गुनाह कबूल करने के लिये भी पैसे मिले हों) अभी सवाल कई इस हत्‍याकाण्‍ड पर उठ रहे हैं और पुलिस की भूमिका दिनोंदिन संदिग्‍ध ही होती जा रही है ।          

 

सोमवार, अप्रैल 20, 2009

रतनजोत : पड़त भूमि के लिए वरदान

रतनजोत : पड़त भूमि के लिए वरदान

Article BY: Regional Public Relations Office- Gwalior Chambal Region

रतनजोत अर्थात जेट्रोफा करकस अर्थात जैव ईंधन वनस्पति पड़त भूमि के लिये वरदान साबित हो रही है । भारतवर्ष में यह सफेद अरण्ड, विदेशी अरण्ड, चंद्रजोत, काला अरण्ड, रेंडा एवं किड बिजौला इत्यादि नामों से भी जानी जाती है। यह यूफोरविएसी फैमली का पौधा है भिण्डी भी इसी फैमली में आती है । यह उष्ण एवं उपोष्णा कटिबन्धीय क्षेत्रों में बहुतायत में पाया जाता है । यह अत्यंत सूखारोधी वनस्पति है किन्तु जल भराव को भी सहन करने की क्षमता रखती है । इसे कोई जानवर नहीं खाता और न ही इसकी पैदावार के लिये रासायनिक खाद अथवा कीटनाशकों की आवश्यकता होती है । रतनजोत अर्थात जेट्रोफा बहुवर्षीय फसल है जो लगातार कई वर्षों तक पैदावार देती है । इसका उपयोग औषधीय,औद्योगिक, जैव ईंधन के रूप में तथा खेतों में बाड़ के रूप में भी किया जाता है । इधर जैव ईधंन के रूप में रतनजोत के उपयोग के बाद कृषक रतनजोत की खेती में अधिक रूचि लेने लगे हैं और जागरूक भी हुये हैं ।

      बहुआयामी वनस्पति रतनजोत अर्थात जेट्रोफा की आधा दर्जन प्रजातियां हैं । दक्षिण भारत तथा बंगाल में जंगल एवं पड़त भूमि में जेट्रोफा ग्लेंडुलिफेरा बहुतायत में पाया जाता है। इसके बीज आकार में छोटे तथा जेट्रोफा करसक की तुलना में कम तेल वाले होते हैं । अन्य प्रजातियों में जेट्रोफा मल्टीफिडा, जेट्रोफा पंडरिफोलिया, जेट्रोफा पोडागिरिका तथा जेट्रोफा गोसिपिफोलिया है ।

       भारत के तीव्र आर्थिक विकास में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति हेतु विदेशों पर निर्भरता एवं उनकी आसमान छूती कीमतें देश के आर्थिक विकास में एक बड़ी बाधा है । ऊर्जा के इस चिंताजनक परिदृश्य में रतनजोत एक अनमोल वानस्पतिक संपदा के रूप में उभरी है । इसके बीजों से मिलने वाले तेल को एक सरल उपचार के बाद इंजनों में डीजल के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है । वहीं दूसरी ओर यह पर्यावरण के लिये सुरक्षित हैं क्योंकि इसमें सल्फर नहीं रहता है ।

रतनजोत में बीज के वजन का 35-40 प्रतिशत एवं गिरि के वजन को 50-60 प्रतिशत तेल होता है । जिसे आर्थिक रूप से उद्योगों के लिये प्रयोग किया जा सकता है । मुख्यत: साबुन बनाने में, जलाने के लिये, लुब्रीकेंट व मोमवत्ती बनाने में इसके तेल का उपयोग किया जाता है । इसके तेल से प्लास्टिक व सिन्थेटिक फाइबर के लिये कच्चा माल भी तैयार किया जाता है । चीन में यह वार्निश बनाने के काम में आता है । रतनजोत की छाल से नीले रंग की डाई मिलती है, जिसमें कपड़ों व मछली पकड़ने वाले जाल को रंगा जाता है । इसका तेल सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण के लिये भी काम में लाया जाता है ।

रतनजोत को कोई जानवर नहीं खाता इसलिये इसे वानस्पतिक बागड या बंधान के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है । इस उपयोग के लिये पौधों को कम दूरी पर लगाना चाहिये। इस तरह रोपित बागड से मृदा संरक्षण, बंधान, सुदृढ़ीकरण एव फसली पौधों की अवांछित जानवरों से रक्षा होती है, साथ ही रतनजोत के बीजों को बेचकर अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है । रतनजोत वर्ष में एक बार अपने सारे पत्ते गिरा देता है, जिससे भूमि को जहां एक ओर कार्बनिक पदार्थ मिलता है, वहीं दूसरी ओर जैविक क्रियायें मिट्टी में बढ़ जाती हैं ।

रतनजोत में जेट्रोफिन नाम का रासायनिक पदार्थ पाया जाता है । जिसमें केंसर प्रतिरोधी क्षमता होने के कारण इसका उपयोग केंसर रोधी औषधियों के निर्माण में किये जाने की अपार संभावनायें मिली है । इसके तेल का उपयोग त्वचा संबंधी रोग जैसे दाद, खाज, खुजली आदि के उपचार हेतु भी किया जाता है ।

 

जेट्रोफा विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं भूमि पर लगाया जा सकता है । शुष्क व अर्ध्दशुष्क पथरीली, रेतीली, बलुई एवं कम गहराई वाली भूमि पर आसानी से लगाया जा सकता है । यह वर्ष में एक बार पत्ते गिरा देने वाला, चिकना, मुलायम काष्ठ युक्त बहुवर्षीय झाड़ीनुमा पौधा है । इसकी ऊचांई 3-4 मीटर, पत्तियां हृदयकार, हल्के पीले हरे रंग की तथा चिकनी होती हैं । पत्तियां तने पर एकान्तर क्रम में विन्यासित होती हैं। शाखाओं के अंतिम सिरे पर सितम्बर से नवम्बर तक सफेद रंग के फूल लगते हैं । अक्टूबर से दिसम्बर तक फल गुच्छों में लग जाते हैं जो कि केप्सूल के रूप में शुरू में हरे रंग के रहते हैं । पकने पर पीले व बाद में कालापन लिये गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं । फल के अंदर अमूमन 3-4 बीज होते हैं जो आकार में छोटे व कालिमा लिये गहरे भूरे रंग के होते हैं ।

रतनजोत का प्रबर्धन बीज एवं कटिंग दोनों तरीकों से संभव है । इसके बीजों एवं कलमों से नर्सरी तैयार कर खेतों में रोपण किया जा सकता है । बीज से नर्सरी तैयार करने के लिये रेत, मिट्टी व गोबर की खाद को 1:1:1 के अनुपात में 500 ग्राम की पॉलिथीन की थैलियों में भरकर उनमें बिजाई कर दी जाती है । बिजाई के बाद झारे से पानी लगाकर मिट्टी को नम रखा जाता है ।

बिजाई फरवरी - मार्च व जुलाई- अक्टूबर में की जाती है । बिजाई के लिये बड़े स्वस्थ्य व भारी बीजों का प्रयोग किया जाता है, इसके लिये बीजों को पहले 24 घंटे पानी में भिगोना चाहिये । नीचे बैठे भारी बीजों की मिट्टी खाद मिश्रण युक्त थैलियों में 2-3 से.मी. गहराई पर बोना चाहिये । बिजाई के 4-6 माह बाद पौधे खेत में लगाने के लिये तैयार हो जाते हैं ।

कलम (कटिंग) से पौधे तैयार करने के लिये कलमों को मातृ पौधे से एकत्रित किया जाता है । ध्यान रहे कि कलमें हरी मुलायम 30-45 से.मी. लम्बी व 3-4 से.मी. मोटी व अधिक आंख (बड) युक्त हों । कलमें क्यारियों में 15


15 से.मी. की दूरी पर लगाई जाती हैं। कलमों में 20-25 दिन में जड़ें आ जाती हैं । 6 माह से एक वर्ष के पौध को खेतों में लगाया जा सकता है । कलम लगाने का उपयुक्त समय फरवरी-मार्च होता है । इस विधि से तैयार पौधों में फल जल्दी आते हैं । नर्सरी में तैयार 6-8 माह तक के पौधों का खेतों में रोपण बरसात आने पर जुलाई से सितम्बर तक किया जाता है । पौधों को 30
30
30
से.मी. से 45
45
45
से.मी. के गढ्ढों में 2
2
मीटर या 3
1.5
मीटर पर लगाया जाना चाहिये । गढ्ढों में यदि 1-2 किग्रा सडी गोबर की खाद, 50 ग्राम नत्रजन (100 ग्राम यूरिया) 30 ग्राम स्फुर (200 ग्राम एस.एस.पी) व पोटाश (50 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश) मिलाकर गढ्ढे को भरें । यदि पौध रोपण के बाद वर्षा न हो तो सिंचाई अवश्य करें । बीज और कलमों को बरसात के समय सीधे भी खेत में गढ्ढे खोदकर व खाद डालकर लगाया जा सकता है । कलम द्वारा तैयार पौधों में बीजोत्पादन अप्रेक्षाकृत जल्दी एवं अधिक होता है । मार्च माह में पौधों को 60-90 से.मी. जमीन  से ऊपर काट दिया जाता है ताकि नई शाखायें निकल सकें। काटने की क्रिया केवल 2-3 वर्ष तक ही करें । इससे पौधे में शाखायें अधिक बन जाती हैं व बीजोत्पादन अधिक होता है ।

रतनजोत को 3


1.5 मीटर में रोपाई कर इसकी पंक्तियों के मध्य में अन्तरवर्तीय फसलें जैसे- कालमेघ, असंगध, मूंग, उड़द व तिल आदि की फसलें ली जा सकती हैं । प्रथम वर्ष रोपाई के बाद पर्याप्त वर्षा न होने पर हल्की सिंचाई करें। शीत व ग्रीष्म ऋतु में क्रमश: 15-20 दिन एवं 7-8 दिन पर सिंचाई करते रहें । दूसरे वर्ष से सिंचाई की आवश्यकता नही होती हैं परंतु सीमित मात्रा में सिंचाई करने से भी बढवार व फलन अच्छा किया जा सकता है। छाल खाने वाली इल्लियां व फलीछेदक इल्लियां रतनजोत के प्रमुख कीट हैं । इसके नियंत्रण हेतु क्विनॉलफॉस 25.सी. या रोगर (2 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिये। कॉलररोट नामक बीमारी इस फसल की शुरूआत में या नर्सरी में देखी जाती है अत: नर्सरी में कार्बन्डाजिम नामक दवा से उपचार कर बीज बोएें । खेत में बीमारी का प्रकोप होने पर इसी दवा को 0.02 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें ।

दूसरे या तीसरे वर्ष फल आने लगते हैं । प्रथम तुड़ाई में 2-5 क्वि. प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है । चार -पाँच वर्षों के बाद 8-14 क्वि. प्रति हैक्टर उत्पादन प्राप्त होने लगता है।

रतनजोत का उपयोग जैव डीजल बनाने में प्रमुखता से किया जाता है । इसके तेल को ट्रांस्एस्टीरिफिकेशन विधि द्वारा बायोडीजल में परिवर्तित किया जाता है । इसमें सबसे पहले रतनजोत के तेल को छाना  जाता है । इसके बाद वसा दूर करने के लिए क्षार से क्रिया कराई जाती है । इसमें अल्कोहल और एक उत्प्रेरक (सोडियम या पोटेशियम हाइड्रॉक्साइड) मिलाया जाता है, जिसके कारण रतनजोत के तेल में उपलब्ध ट्राइग्लिसराइड्स इनसे क्रिया कर ईस्टर व ग्लिसरॉल का निर्माण करते हैं । जिन्हें अलग-अलग करके शुध्द कर लिया जाता है । ईस्टर को बायोडीजल के रूप में प्रयोग करते हैं ।