सोमवार, जुलाई 06, 2009

आओ विद्युत बचाएं: देश को आगे ले जायें, विद्युत की बचत ही विद्युत का उत्पादन है

आओ विद्युत बचाएं: देश को आगे ले जायें, विद्युत की बचत ही विद्युत का उत्पादन है

आदेश शर्मा (भारद्वाज)

काशी नरेश की गली , भारद्वाज बाडा ग्वालियर, मोबाइल : 9826284045

       विद्युत राष्ट्रीय ऊर्जा है तथा राष्ट्र की समृध्दि और विकास का आधार भी। विद्युत ऊर्जा के उपयोग और उपभोग के प्रति आम जनता और उपभोक्ता की सोच दूरगामी परिणामों को लेकर गंभीर नहीं है। विद्युत का उपयोग  बेदर्दी और प्रतिस्पर्धात्मक आधार पर हो रहा है। आम तौर पर होने वाले कार्यक्रमों में इस तरह की स्पर्धा बढ़-चढ़ कर देखी जा सकती है । प्राय: लोग विद्युत उपयोग का भी दिखावा करते हैं और कहते हैं कि ''हमने इतनी रोशनी की'' हमें ऐसे थोथे विचारों को त्यागना होगा जो राष्ट्रीय ऊर्जा का संकट बढाने वाले साबित हों । दरअसल विद्युत का मितव्ययता से उपयोग ही राष्ट्र  और समाज के भविष्य को मजबूती प्रदान करने वाला हो सकता है।

       विद्युत ऊर्जा का उपयोग हमें अपनी कड़ी मेहनत से अर्जित धन की तरह करना चाहिए। साथ ही हमें अपने मन में यह भाव भी लाना होगा कि हम राष्ट्रीय ऊर्जा का अनावश्यक और अनाधिकृत उपयोग कर अपराध न करें । विद्युत ऊर्जा के अनियमित उपयोग से बिजली और पानी की समस्या विकराल रूप ले रही है जिससे सामाजिक वैमनस्यता बढ रही है और राष्ट्रीय और सामाजिक प्रगति भी अवरूध्द होती है।

       हमारे देश में पॉच तरीकों से विद्युत उत्पादन किया जा सकता है इनमें से (हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी ) जल विद्युत इकाई के निर्माण एवं उपयोग योग्य बनाने में लगभग 10 से 12 वर्ष का समय, हजारों व्यक्तियों का श्रम और 1000 करोड़ की  अनुमानित लागत आती है तब कहीं  450 से 500 मेगावॉट विद्युत उत्पादन वाली विद्युत इकाई स्थापित होती है । जिससे प्रति यूनिट उत्पादन लागत लगभग 60 पैसे आती है ।

कोयले से उत्पादित की जाने वाली (ताप विद्युत) इकाई के कार्य को पूरा करने में पांच वर्ष छ: माह का समय और लगभग 500 करोड़ की लागत आती है जिससे 250 से 500 मेगावॉट का उत्पादन होता है । ताप विद्युत ऊर्जा की  लागत 2.50 रूपये प्रति यूनिट आती है। वहीं नाभिकीय विद्युत (न्युक्लिीयर इलेक्ट्रिीसिटी) इकाई को उत्पादन योग्य बनाने में पॉच वर्ष का समय और 900 करोड़ रूपये की राशि खर्च कर 500 से 1000 मेगावॉट विद्युत उत्पादन किया जा सकता है । नाभिकीय ऊर्जा की प्रति यूनिटउत्पादन लागत लगभग 1.90 रूपये  आती है। सौर ऊर्जा और वायु वेग से  (विन्ड इलेक्ट्रिसिटी) विद्युत उर्जा का उत्पादन रेगिस्तानों अथवा समुद्री तटों आदि पर जहां सूर्य की तेज किरणों से अथवा तीव्र गति वायु औसतन 60 से 75 किमी प्रति घण्टा के वेग से चलती हो से किया जाता है ।

काफी समय, कठिनाईयों, करोड़ों रूपये की लागत तथा हजारों हाथों की मेहनत से उत्पादित विद्युत ऊर्जा की मांग जिस तेजी से बढ रही है उसके अनुरूप उत्पादन किया जाना संभव नहीं हो पा रहा । भविष्य  में ऊर्जा संकट से निजात दिलाने के लिये सरकार ने बिरसिंगपुर में 500 मेगावॉट और अमरकंटक में 210 मेगावॉट बाणसागर, टोन्स, रीवा के सिलपरा में तीन विद्युत इकाईयों में 40 मेगावॉट, 30 मेगावॉट और 20 मेगावॉट के अलावा मणी खेडा बांध पर भी एक  जल विद्युत ईकाई को उत्पादन योग्य बनाया जा रहा है । म.प्र. शासन और विद्युत मण्डल दोनों की जागरूकता से विद्युत के क्षेत्र में किये जा रहे सकारात्मक प्रयास  भी दिखाई दे रहे हैं। इन प्रयत्नों के साथ - साथ विद्युत उपभोक्ताओं का सक्रिय सहयोग भी अति आवश्यक है।  हमें विद्युत उर्जा बचत के लिये कम उर्जा खपत कर अधिक रोशनी प्रदान करने वाले सी.एफएल को उपयोग में लाना चाहिये। साथ ही जब भी घर के बाहर जावें बत्ती  बुझाना भी न भूलें  ।

       सड़क बत्ती के उपयोग में 250 वॉट के हैलोजन बल्वों की जगह 100 वॉट की सी.एफ.एल उपयोग में लावें ।  साथ ही सर्किट व्यवस्था से चलने वाली सड़क बत्ती को अमल में लाना चाहिये। ऊर्जा संकट में ए.सी. तथा अधिक विद्युत खपत वाले उपकरणों का मित्तव्ययता से उपयोग करना चाहिये ताकि ए.सी. से बाहर निकलने पर होने वाले शारीरिक तापमान के असन्तुलन से  होने वाली बीमारियों से भी बचा जा सके ।  इस प्रकार सावधानी से जहाँ हम शरीर को स्वस्थ्य रख सकते हैं वहीं ऊर्जा बचत के महायज्ञ में भी अपना योगदान दे सकते हैं ।

       ऊर्जा बचत हमें जोड़ती है । परिवार के सभी सदस्य एक कमरे में इकट्ठा बैठकर बत्ती, पंखा या कूलर का सामूहिक उपभोग करके भी विद्युत की बचत कर सकते हैं ।  नगरीय क्षेत्र में पानी के लिये प्रत्येक घर में प्रयुक्त होने वाली 250 वॉट की विद्युत मोटरों को एक साथ एक समय में चलाकर भारी विद्युत ऊर्जा खर्च की जाती है । अगर वार्ड और मोहल्लों में पानी की बडी टंकियों निर्मित की जाकर ज्यादा दबाब से पानी दिये जाने की व्यवस्था को व्यवहार में लावें तो विद्युत की काफी बचत की जा सकती है।   

       विवाह समारोह और अन्य सार्वजनिक आयोजनों हेतु उपयोगी क्षेत्रफल में पर्याप्त प्रकाश मिलने में उपयोग होने लायक भार की  ही स्वीकृति प्रदान की जावे । एक ही स्थान पर    चार-चार बल्वों का उपयोग न करें । अनावश्यक उपयोग की जा रही विद्युत ऊर्जा को रोका जाकर विद्युत बचत की जा सकती है। यदि संभव हो तो शादी समारोह आदि दिन में आयोजित किये जावें जिससे बिजली की बचत होगी । स्कूलों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को विद्युत उपयोग की महत्ता से अवगत कराने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं ।साथ ही सरकारी कार्यालयों में सीमित विद्युत उपयोग किया जावे । प्रदेश के शासकीय कार्यालयों द्वारा देश के अन्य राज्यों के समान पांच दिवसीय कार्यशील सप्ताह शैली को अंगीकार किया जाना चाहिये। बाजार सायं काल जल्दी बन्द किये जावें। सड़क बत्ती सांयकाल देरी से चालू की जाकर सुबह जल्दी बन्द की जावें।  हीटर/गीजर की जगह सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण का उपयोग किया जावे तथा सी एफ एल सस्ती दरों पर सुलभ हों । विद्युत बचत के उपायों को अपनाकर हम मॉल एवं शापिंग कॉम्पलेकसों में उपयोगिता के आधार पर विद्युत का उपयोग हो न की प्रदर्शनार्थ अनाप - शनाप विद्युत प्रयुक्त की जावे। भवनों के निर्माण में प्राकृतिक  प्रकाश का अधिक लाभ मिले, इस बात का ध्यान रखा जावे।     विद्युत बचत के उपायों को अपनाकर हम  करोड़ों रूपये और हजारों हाथों की कड़ी मेहनत से उत्पादित की जाने वाली विद्युत ऊर्जा के उचित उपयोग से प्रदेश के उद्योगों, कृषि क्षेत्र और चिकित्सा जैसे अतिमहत्वपूर्ण कार्य हेतु पर्याप्त विद्युत ऊर्जा प्रदान कर प्रदेश और देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकते हैं।

 

आदेश शर्मा (भारद्वाज)

काशी नरेश की गली

भारद्वाज बाडा ग्वालियर

मेबाइल : 9826284045

 

समलैंगिक विवाद : 'सर्वश्रेष्ठ प्राणी' की 'श्रेष्ठता' पर उठते सवाल

समलैंगिक विवाद :  'सर्वश्रेष्ठ प्राणी' की 'श्रेष्ठता' पर उठते सवाल

निर्मल रानी, email: nirmalrani@gmail.com nirmalrani2000@yahoo.co.in nirmalrani2003@yahoo.com 163011, महावीर नगर,  अम्बाला शहर,हरियाणा फोन-98962-93341

       हमारे धर्मशास्त्र हमें यह बताते हैं कि ईश्वर ने पृथ्वी पर 84 लाख विभिन्न यौनियों के रूप में प्राणियों की संरचना की है। प्राणियों की इस विशाल सूची में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में स्वीकार किया गया है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार भी अल्लाह ने इंसान को अशरंफुल मंखलूंकात के रूप में स्थान दिया है। जिसका अर्थ है प्रकृति की सभी रचनाओं में सर्वोत्तम। ंजाहिर है इंसान रूपी ऐसे विशिष्ट प्राणी से इसी प्रकार की विशिष्ट, असाधारण तथा सर्वश्रेष्ठ कारगुंजारियों की भी उम्मीद की जानी चाहिए। नि:संदेह समय व काल के अनुरूप यह सर्वश्रेष्ठ प्राणी ऐसी अनेक कारगुंजारियां अंजाम देता आ रहा है जिसने इंसान के सर्वश्रेष्ठ होने की मान्यताओं पर मोहर लगाई है तथा इसकी पुष्टि की है। परन्तु इसी के साथ-साथ कभी-कभी यह भी देखा गया है कि इसी इंसान रूपी प्राणी ने कभी-कभी अनैतिकता तथा घटियापन की उन सीमाओं को भी पार किया है जिनकी उम्मीद जानवरों से भी नहीं की जा सकती।

              कुदरत ने पृथ्वी पर जितने प्राणियों की संरचना की, उन सभी में दो प्रकार के लिंग की व्यवस्था की। एक पुल्लिंग तथा दूसरा स्त्रीलिंग। इन्हीं दोनों लिंगों के माध्यम से पूरी सृष्टि का निर्माण हुआ तथा यह सिलसिला अभी तक जारी है। बड़े आश्चर्य की बात है कि इंसान रूपी तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के अतिरिक्त पृथ्वी के शेष अन्य सभी 'अश्रेष्ठ' कहे जा सकने वाले प्राणियों ने तो प्रकृति द्वारा निर्धारित सभी मापदंडों की लाज रखते हुए उसके बनाए नियमों का अक्षरश: पालन किया तथा आज भी करते आ रहे हैं। परन्तु अपनी बुद्धिमता का परचम लहराने वाला इंसान ंकुदरत द्वारा निर्धारित लिंग भेद की सीमाओं तथा मापदंडों की अवहेलना करने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहा है।

              इंसानों के मध्य से एक नए एवं अप्राकृतिक रिश्ते के सूत्रपात की ंखबरें आ रही हैं जिसे समलैंगिक रिश्तों का नाम दिया जा रहा है। इसका अर्थ है कि कोई भी पुरुष किसी अन्य पुरुष के साथ तथा कोई भी स्त्री किसी अन्य स्त्री के साथ अपनी इच्छानुसार यौन संबंध स्थापित कर सकते हैं। इस प्रकरण में सुखद बात केवल यह है कि इंसानों में ऐसी सोच तथा ऐसे विचार रखने वालों की संख्या नाममात्र है। परन्तु इसके बावजूद भारत सहित दुनिया के अन्य तमाम देशों को मिलाकर ऐसे लोगों की संख्या अब इतनी ंजरूर हो गई है कि इनकी आवांज को दुनिया सुन रही है तथा महत्व भी दे रही है।

              भारतवर्ष अपनी स्वयं की संस्कृति एवं सभ्यता रखने वाला एक प्राचीन देश है। यहां धार्मिक एवं प्राकृतिक मान्यताओं का सदैव आदर किया जाता रहा है। यही वजह है कि समलैंगिकता जैसा मनोरोग इस देश में कभी भी फल-फूल नहीं पाया। संभवत: यही वजह रही होगी जबकि विश्वव्यापी ब्रिटिश उपसाम्राज्यवाद के दौर में समलैंगिकता के विरुद्ध यदि कहीं ंकानून बनाया गया अथवा समलैंगिकता को ंगैरंकानूनी घोषित किया गया तो वह भारत ही दुनिया का पहला देश था। 1860 ई0 में लॉर्ड मैकॉले ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अन्तर्गत इसे अपराध घोषित किया। परन्तु गत् 2 जुलाई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक आन्दोलन चलाने वालों के पक्ष में एक ऐसा निर्णय सुना दिया जिससे कि 'सर्वश्रेष्ठ प्राणी' की श्रेष्ठता पर वांकई एक बड़ा प्रश्चिन्ह लग गया। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह तथा न्यायाधीश एस मुरलीधर की न्यायपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए यह ंफैसला दिया कि समलैंगिक रिश्ते बनाना धारा 377 के अन्तर्गत अपराध की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि इस ंफैसले के साथ-साथ न्यायपीठ ने व्यस्क होने अर्थात् 18 वर्ष से अधिक की आयु होने तथा आपसी रंजामंदी होने की शतर्ें भी साथ रखी हैं। अदालत के इस ंफैसले से समलैंगिक रिश्ते रखने वाले तथा इनके प्रति हमदर्दी रखने वालों में कांफी जोश व उत्साह देखा जा रहा है। परन्तु भारत का सभ्य समाज चाहे वह किसी भी धर्म व सम्प्रदाय का क्यों न हो, उच्च न्यायालय के इस ंफैसले से हतप्रभ है।

              समलैंगिक रिश्तों को मान्यता दिलाए जाने की लड़ाई लड़ने वाले संगठन जो गत् 8 वर्षों से अपने कथित अधिकारों के लिए संघर्षरत थे, अब लुकछुप कर अपने रिश्ते स्थापित करने के बजाए और मुखरित होकर अपने संबंधों का ढिंढोरा पीटने तथा इसे प्रचारित करने की मुद्रा में हैं। यह मुट्ठीभर लोग समलैंगिक रिश्तों को लेकर अपने सामाजिक व मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं। इनका तर्क है कि इन्हें इनकी ंखुशी व मंर्जी के अनुरूप रहने व जीने दिया जाए। अपनी निराली तथा आश्चर्यपूर्ण इच्छाओं को मनवाने की कोशिशों में लगा यह वर्ग प्राकृतिक तथा नैतिक मान्यताओं की ओर ध्यान देना ही नहीं चाहता। इस नाममात्र वर्ग को तो बस अपनी संतुष्टि तथा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने मात्र की ही चिंता है। यह वर्ग इस ओर भी ध्यान नहीं देना चाहता कि उनकी इन हरकतों का नई युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

              आज दुनिया मौसम के बदलते मिंजाज को लेकर कितना चिंतित व परेशान है। इसका कारण मनुष्य द्वारा सही दिशा में आगे बढ़ते हुए विकास के मार्ग तेंजी से तय करना तथा विकास के ही नाम पर होने वाले जंगलों की कटाई, चिमनी से उठने वाले धुएं, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की संख्या में प्रतिदिन होने वाला इंजांफा तथा युद्ध से जूझने वाले हालात आदि हैं। इन सभी क्रियाओं के सकारात्मक तथा प्राकृतिक होने के बावजूद इस समय सृष्टि पर ऐसा ंखतरा मंडरा है जिसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया जा रहा है। कल्पना कीजिए कि यदि इंसान द्वारा इंसानी रिश्ते स्थापित करने के लिए अप्राकृतिक यौन संबंधों का सहारा लिया गया और वह भी केवल इंसान की संतुष्टि एवं उसकी ंखुशी की ंखातिर तो इस पृथ्वी पर क्या कुछ नहीं घट सकता।

              इंसान की इच्छाएं असीम होती हैं। अप्राकृतिक रूप से समलैंगिक संबंध स्थापित करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपने यौन सुख की ंखातिर समलैंगिक होने के अतिरिक्त अन्य किसी स्तर तक भी जा सकता है। यदि वह किसी अन्य प्राणी के साथ यौन संबंध स्थापित करना चाहे, तब भी ऐसा इंसान अपने पक्ष में तरह-तरह के तर्क पेश कर सकता है। और यदि भविष्य में 'बदलते समय' के नाम पर ऐसे रिश्ते स्थापित किए जाने को भी सामाजिक मान्यता प्रदान कर दी गई तो निश्चित रूप से यह पृथ्वी रहने योग्य नहीं रह जाएगी। ऐसे रिश्ते समाज में कैसे विकार पैदा करेंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

              अत: ंजरूरत इस बात की है कि समलैंगिक रिश्तों को ंकायम करने वाले तथा इनकी वकालत करने वाले लोग जो निश्चित रूप से हमारे ही भाई-बहनों के समान हैं तथा हमारे ही समाज के प्रमुख अंग हैं, को इस विषय पर समझाया बुझाया जाए तथा समलैंगिकता के रूप में प्रकट होने वाले मनोरोग रूपी इस लक्षण का समुचित इलाज कराया जाए। ऐसा नहीं है कि समलैंगिकता के पक्ष में सैकड़ों तर्क प्रस्तुत करने वाला यह मुट्ठी भर वर्ग समलैंगिक रिश्तों के बाद मिलने वाले संभावित भयावह परिणामों को समझ नहीं सकेगा। यहां इस विषय पर इस्लामी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। इस्लामी इतिहास में हंजरत लूत नामक एक पैंगम्बर हुए हैं। कहा जाता है कि एक विशेष क्षेत्र के लोग उनके समय में पुरुषों के मध्य समलैंगिक रिश्ते अत्याधिक स्थापित करते थे। ंखुदा को जब यह बात नागवार गुंजरी तब आकाशवाणी के माध्यम से खुदा ने हंजरत लूत को यह पैंगाम दिया कि वे लोगों को अपनी इस ंगैर ंकुदरती हरकतों से बांज आने को कहें अन्यथा उन्हें ंखुदा के ंकहर का सामना करना पड़ेगा। हंजरत लूत ने ंखुदा का पैंगाम आम लोगों तक पहुंचाया परन्तु आवाम ने पैंगम्बर द्वारा जारी किए गए ंखुदा के हुक्म की अनसुनी कर दी। परिणामस्वरूप उस पूरे क्षेत्र में बड़े-बड़े पत्थरों की भीषण बारिश हुई। ंखुदा के इस अंजाब के बाद लोगों की आंखें खुलीं और उन्होंने अपने दुष्कर्मों से तौबा की।

              प्राकृतिक प्रतिक्रया से सम्भवत: बेंखबर दिल्ली उच्च न्यायालय के ंफैसले ने हालांकि समलैंगिकों की हौसलाअंफंजाई की है। परन्तु ऐसा नहीं लगता कि उच्चतम न्यायालय व भारतीय संसद भी दिल्ली उच्च न्यायालय का समर्थन करेगा। समाज तथा सरकार को इस बात की पूरी कोशिश करनी चाहिए कि किसी भी प्रकार से भारत में रहने वाले समलैंगिकों को यह समझाया जा सके कि उनके द्वारा मात्र उनकी यौन संतुष्टि अथवा ंखुशी के लिए उठाया जाने वाला उनका कोई भी ंकदम न केवल प्रकृति विरोधी तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता का विरोधी है बल्कि देश की कर्णधार नई युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए भी ऐसी कोशिशें अत्यन्त घातक हैं।   निर्मल रानी

 

शनिवार, जुलाई 04, 2009

कनेरा अपहरण काण्‍ड - अपराधी राजकुमार व राजनारायण पर 25-25 हजार का इनाम

अपराधी राजकुमार व राजनारायण पर 25-25 हजार का इनाम

ग्वालियर 3 जुलाई 09। पुलिस महानिदेशक श्री एस के . राउत ने दो अपराधियों की गिरफ्तारी पर 25-25 हजार रूपये का नकद इनाम घोषित किया है।

      पुलिस मुख्यालय भोपाल से प्राप्त जानकारी के अनुसार पुलिस महानिदेशक ने अपराधी द्वय राजकुमार पुत्र राम सनेही शर्मा व राजनारायण पुत्र रामसनेही शर्मा निवासी सिमराई थाना खेराराठोर जिला आगरा हाल निवास सुच्चापुरा जिला भिण्ड की गिरफ्तारी पर यह पुरस्कार घोषित किये हैं। इन दोनों अपराधियों के खिलाफ भिण्ड जिले के पुलिस थाना गोरमी, पावई, व अटेर तथा मुरैना जिले के पुलिस थाना अम्बाह में संगीन अपराध दर्ज हैं। पुलिस महानिदेशक द्वारा घोषित उक्त नकद पुरस्कार उन व्यक्यियों को प्रदान किया जायेगा, जो विधि संगत शक्तियों का प्रयोग कर इन अपराधियों को बन्दी बनायेगा या बन्दी बनाने के लिये पुलिस को सही सूचना देगा।

 

मंगलवार, जून 30, 2009

बेवसाइट का बिजली पानी सप्‍लाई पूरी तरह बन्‍द, पिछले 60 घण्‍टे से नहीं है बिजली

बेवसाइट का बिजली पानी सप्‍लाई पूरी तरह बन्‍द, पिछले 60 घण्‍टे से नहीं है बिजली

समाचार अपडेशन - खेद सूचना

हमें खेद है कि मुरैना म.प्र. में चल रही पिछले एक माह से बिजली कटोती विगत चार पाँच दिन से पूरे दिन और रात की बिजली कटोती में बदल जाने के कारण समाचार अद्यतन नहीं हो पा रहा है । विद्युत व्यवस्था सही होने या प्रशासनिक परिवर्तनों के बाद पूर्ववत अद्यतन किया जा सकेगा । अभी शहर मुरैना में 27 जून से वेबसाइट ग्‍वालियर टाइम्‍स के गांधी कालोनी मुरैना स्थित कार्यालय की बिजली सप्‍लाई का फीडर पूरी तरह अलग करके केवल वेबसाइट के कार्यालय के आसपास बिजली और पीने का पानी सप्‍लाई पूरी तरह बन्‍द कर दी गई है पिछले करीब 60 घण्‍टे से वेबसाइट कार्यालय क्षेत्र में बिजली पानी पूरी तरह बन्‍द होने के कारण अब अपडेट संभव नहीं है, परिणामत: भिण्‍ड, मुरैना और ग्‍वालियर के कुछ समाचार जो कि मुरैना के गांधी कालोनी कार्यालय से किये जाते हैं अब अपडेट होना संभव नहीं हैं अन्‍य कार्यालयों व अन्‍य शहरों से होने वाले अपडेट यथावत जारही रहेंगे ।  हमारा वायदा है हम अपनी पूर्व घोषित बनिया प्रशासन और भ्रष्‍टाचार तथा आपराधिक मामलों सम्‍बन्‍धी खबर अवश्‍य प्रकाशित करेंगे । अभी वेबसाइट कार्यालय की बिजली पानी सप्‍लाई मुरैना में पूरी तरह बन्‍द कर दिये जाने से समाचार अद्यतन संभव नहीं है ।

 

शनिवार, जून 27, 2009

19 घण्टे तक चैलेन्ज के साथ ठोक के बिजली कटौती, पानी सप्लाई अपने आप ही बन्द

नर्रा रहे मीडिया का टेंटुआ ऐंठा, बिजली पानी पूरी तरह बन्द, ग्वालियर चम्बल में कोहराम

19 घण्टे तक चैलेन्ज के साथ ठोक के बिजली कटौती, पानी सप्लाई अपने आप ही बन्द

हम अमन चाहते हैं जुल्म के खिलाफ, फैसला गर जंग से होगा तो जंग ही सही !  

ग्वालियर/ भिण्ड/ मुरैना/ श्योपुर 16- 27 जून 09 , सरकार से पंगा यानि खुलेआम दंगा ! ग्वालियर चम्बल संभाग में पिछले 1 जून से की जा रही अंधाधुन्ध अघोषित कटौती पर जहाँ आम जनता और वकीलों ने सड़को पर उतर कर आन्दोलन तथा विरोध प्रदर्शन के जरिये भारी भभ्भर मचा रखा था वहीं मीडिया दनादन और धुऑंधार बिजली कटौती के खिलाफ खबरें लगाने में जुटा था !

अंतत: सरकार को जो करना था वह उसने कर डाला, भारत की दो कहावत बड़ी मशहूर हैं एक तो - काला बामन गोरा ..... इसका मतलब और अर्थ म.प्र. वासी इस समय भली भांति समझ रहे हैं दूसरी भैंस पूंछ उठायेगी तो का करेगी.....गोबर ! यानि जित्ती ज्यादा से ज्यादा बिगाड़ने की ताकत होगी बस उत्ता ही बिगाड़ेगी !

ग्वालियर चम्बल वाले इन दिनों इन कहावतों से रोजाना दो चार हो रहे हैं !

बदला बदला बदला, बदला लेना केवल चम्बल वालों का प्रायवेट हक ही नहीं बल्कि सरकार भी इस हक से परिपूर्ण है !

नर्रा रहे मीडिया और आन्दोलन कारीयों को आखिर सबक सिखाते हुये ग्वालियर चम्बल के समूचे जिले में शहरों और गॉवों में सोमवार 15 जून से सरकार ने खासी रणनीति के तहत विशेष कार्यवाही की ! हुआ ये कि चुन चुन कर कुछ चुनिन्दा क्षेत्र विशेषों में बिजली सप्लाई सुबह नियमित बिजली कटौती के साथ रात 1 बजे तक के लिये पूरी तरह बन्द कर दी ! बिजली सप्लाई बन्द होने से पीने का पानी अपने आप ही बन्द हो गया ! और सरकार के कहर से इन पीड़ित क्षेत्र विशेष में बिजली पानी के लिये त्राहि त्राहि मच गयी ! 23 जून से यह बिजली कटौती सबेरे 6 बजे से रात 3 बजे तक कर दी ।

मजे की बात ये रही कि बिजली घर पर जब इस सम्बन्ध में चर्चा की गयी तो बिजली घर वालों का रिरियाते हुये जवाब था कि का करें साब आप तो जानते ही हैं, हम मजबूर हैं ऊपर से जबरदस्ती बिजली काटने का आदेश दिया है, कारो बामन है, बमहनियाई तो दिखावेगा ! बिजलीघर के इस अप्रत्याशित जवाब को हमने रिकार्ड किया है !

कारो बामन तो स्टेट लेवल पर है लेकिन मुरैना मे तो बनियों की सरकार है, प्रभारी मंत्री, संभाग आयुक्त, कलेक्टर से लेकर एस.ई. जे.ई सब बनिये बैठे हैं, ये बनिये कब से बमहिनयाई करने लगे, हम गरजे, वह फिर रिरियाया ! का करें साब हम पर दया रखना, हम मजबूर हैं !

चलो खैर उस गरीब छोटे कर्मचारी से आगे बात करना बेकार था लेकिन यह अनुभव सारे विश्व के साथ शेयर करने लायक जरूर है !

खैर बिजली काटने से हमें नुकसान कम सरकार को नुकसान ज्यादा है , समाचार नहीं प्रकाशित होते तो साली सरकार के नहीं छपते, हमारा आलेख कभी रूकता नहीं, पूरी दम लगा लें तो भी रोक नही सकते !

खैर म.प्र. स्वर्णिम राज्य बनने जा रहा है, पूत के पाँव पालने में नजर आ रहे हैं, जब आप पूरे संभाग में पूरी प्रशासनिक सरकार केवल एक जाति विशेष की बैठा देते हैं तब ऐसा ही होता है, यह हमारा पुराना अनुभव है ! खैर मुरैना की सरकार तो सेठ जी के हाथों में है सो यहाँ जो भी अफसर रहेगा सेठ जी का आदमी ही रहेगा, कोई हैरत की बात नहीं ! पता नहीं कैसे पुलिस विभाग में अभी तक बनिये क्‍यों नहीं भेजे , मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह जी हमारी इल्‍तजा है कि मुरैना पुलिस जो अब तक ठीक ठाक चल रही है, कोई बनिया एस.पी. और सी.एस.पी. तलाश के मुरैना भिजवा दो, दूसरी जाति के अफसर शोभा नहीं दे रहे और ऐसे लग रहे हैं जैसे बगुलों के बीच में हँस घुस बैठे हों । बनिये कलेक्‍टर और कमिश्‍नर यहॉं पहले भी रहे हैं लेकिन सरकार की आजादी से लेकर ऐसी दुर्दशा हमने आज तक नहीं देखी । और हॉं लगे हाथ एकाध बनिये को जिला पंचायत और शिक्षा विभाग में भी भिजवा देना, जिससे बनिया प्रशासन की टेढ़ी नजर इन विभाग पर से हट जाये । बनिया प्रशासन अभी उन्‍हीं विभागों पर कहर ढा रहा है जहॉं बनिये अफसर नहीं हैं ।      

अभी प्रभारी मंत्री की पत्रकारवार्ता को गुजरे महज दो हफ्ते ही गुजरे हैं और बिजली कटौती पर प्रभारी मंत्री की पत्रकारों ने 70 फीसदी टाइम तक खिंचाई की ओर मंत्री को बिना जवाब दिये ही पत्रकार वार्ता खत्म करके बिलबिलाते हमने ऑखों से देखा था ! संयोग देखिये कि प्रभारी मंत्री भी बनिया है ! यानि ऊपर से नीचे तक तराजू तनी है !

अब का कहिये - अंजामे गुलिस्तां का होगा, हर जगह तराजू ठुकी हुयी ! तौल के मिलेगी पानी और बिजली, नर्राओगे तो टेंटुआ दाब के कटेगी बिजली और पानी !

बनिया प्रशासन के कारनामों पर हमने पूरी रिपोर्ट तैयार की है और हम जगत को बताने के भारी इच्‍छुक हैं कि कैसे चम्‍बल में इन दिनों हर चीज पर हर सरकारी काम पर सौदेबाजी होती है और भ्रष्‍टाचार का नंगा ताण्‍डव चम्‍बल में चल रहा है, केवल भ्रष्‍टाचार ही नहीं बल्कि कई नंगे सच इस रिपोर्ट में हैं । हमें नहीं लगता कि आपका बनिया प्रशासन इसे छपने देगा , हॉंलांकि इस रिपोर्ट का 70 फीसदी भाग चम्‍बल पर और 30 फीसदी भाग समूचे मध्‍यप्रदेश पर है , हम आपके स्‍वर्णिम मध्‍यप्रदेश के कुछ राज फाश करने के लिये बेताब हैं, कुछ मामले तो तत्‍काल कार्यवाही योग्‍य हैं । बिजली रही तो वायदा है जल्‍दी ही इसकी पूरी श्रंखला छापेंगें भी और कार्यवाही भी करवायेंगें । आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा । विष वृक्षों को उखाड़ फेंकना अपना पुराना शौक है । हम इसे उखाड़ फेंकेंगे यह हमारा प्रण है । बिजली नहीं रहे ये दुआ करना, जब तक बिजली नहीं तभी तक टोपी सलामत मानना सेठजी ।    

ये भारत का नया संविधान है, नया संस्करण है भईये जहाँ हर अफसर, मंत्री और मातहत बनिया होवेगा, तराजू साथ रखेगा, ठाला बैठा तौल बॉट करेगा, धरजा और मरजा का राग अलापेगा ! ऐसी की तैसी लोकतंत्र की करेगा ! जय श्री राम, जय हिन्द, जय भारत !

 

शुक्रवार, जून 26, 2009

गोरमी के बाशिंदे प्यासे,बिजली गोल (दैनिक मध्‍यराज्‍य)

गोरमी के बाशिंदे प्यासे,बिजली गोल

--मिजाजीलाल अग्रवाल द्वारा

भिण्‍ड 25 जून 09 (दैनिक मध्‍यराज्‍य) गोरमी। मध्यप्रदेश में जारी बिजली के संकट से गोरमी भी अछूती नही है बिजली के अभाव.में लोग बूंद बूंद पानी को  तरस रहे है नगर पंचायत के पास बिजली के अभाव में जनरेटर की ब्यवस्था  नही होने की वजह से यहा के बाशिंदो को प्यासा ही रहना पड रहा है नलों में पानी नही है और बिजली रात व दिन भर गोल रहती है।

भिंड जिले के गोरमी कस्वा में यहा के वाशिदों को वुनियादी सुविधा मुहैया कराने के लिये नगर पंचायत का गठन किया मगर बर्तमान नगर पंचायत बुनियादी सुविधा दिलानें में असफल रही है बिजली का आलम यह कि दिन में चार घंटे तो रात भर बिजली के गोल रहने से लोग गर्मी में कूलर पंखो से महरूम है तो चोर उच्चके अपने मकशद में कायमयाव हो रहे है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार शासन के नियमानुसार बिजली के अभाव में नगर पंचायतों को जनरेटर की ब्यबस्था कर अतिआवस्यक सेवा जेसे पानी और स्ट्रीट लाईट को वहाल करना चाहिये मगर गोरमी में ऐसा नही हो रहा है।

 

गुरुवार, जून 25, 2009

जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की बावड़ियाँ

जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की  बावड़ियाँ

- देव श्रीमाली

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता  विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)

ग्वालियर संगीत की नगरी है । इसी जमीं पर मियाँ तानसेन उर्फ तन्ना मिश्रा ने संगीत का ककहरा सीखा । संगीत सम्राट बने और बादशाह अकबर के नौ रत्नों में शुमार हुए । तोमर राजवंश के महान शासक राजा मानसिंह तोमर ने यहीं पर 'ध्रुपद' की रचना की। लेकिन संगीत ही नहीं ग्वालियर के शासकों का प्रेम जल संरक्षण को लेकर भी उतना ही प्रगाढ़ रहा है जितना संगीत के प्रति । इसकी गवाही देने के लिए आज भी ग्वालियर शहर के कोने - कोने पर कहीं जीर्ण शीर्ण तो कहीं ठीक ठाक हालत में मौजूद बावड़ियों के अवशेषों से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।

       ग्वालियर बावड़ियों के लिहाज से इतना समृध्द है और इनका निर्माण इतने शानदार स्थापत्य के साथ और कलात्मक तरीके से कराया गया है कि आज के इंजीनियर तक इन्हें देखकर चमत्कृत हो जाते हैं । यही वजह है कि कई बार तो जल संरक्षण से जुड़े लोग कहते हैं कि ग्वालियर को सिर्फ संगीत ही नही बल्कि '' संगीत और बावड़ियों का शहर '' कहा जाना चाहिए ।

       दरअसल ग्वालियर का जन्म ही चमत्कारिक जल के जल संरक्षण के प्रयासों के साथ ही हुआ अर्थात ग्वालियर राज्य की नींव ही एक बावड़ी की स्थापना के साथ हुई । ग्वालियर के ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण गोपगिरि पर्वत पर किया गया जो बाद में गोपाद्रि और उसके बाद गोपाचल पर्वत कहलाया । फजल अली के एतिहासिक ग्रंथ - 'कुलियाते ग्वालियर' जो कि अकबर के शासन काल में लिखा गया था, मैं ग्वालियर के क्षेत्रीय इतिहास के उपलब्ध फारसी स्त्रोतों में लिखा है - '' विक्रमादित्य के हुकूमत के 332 वर्ष गुजरे थे और हिजरी सन् 332 वर्ष पूर्व एक जमींदार सूरसेन का था, उसने ग्वालियर किले की बुनियाद रखी । उसने प्रथम निर्माण ' सूरजकुंड ' के रूप में करवाया तथा ग्वालिपा ऋषि के आर्शीवाद से 36 वर्ष राज्य किया । इस मामले को लेकर एक किंवदंती थी इस अंचल में शताब्दियों से प्रचलित है । इसके मुताबिक सूरसेन कोढ़ रोग से पीड़ित था और बड़ा जमींदार होने के बावजूद अपने इस रोग के कारण बहुत दु:खी रहता था । एक बार वह जंगल में भटकते हुए गोपगिरि पर पहुँच गया जहाँ ग्वालिपा ऋषि तपस्यारत थे । प्यास से व्याकुल सूरसेन को देखकर ग्वालिपा ऋषि ने उससे कहा -'' बहुत दु:खी और परेशान हो । जाओ सामने के कुण्ड में जाकर हाथ धोकर पानी पी लो ।'' ऋषि ग्वालिपा के बताये अनुसार जब वह पास में स्थित छोटे से गड्डे के पास पहुँचा और उसने पानी में हाथ डालकर धोए । पानी पीकर प्यास बुझाने के बाद जब उसकी निगाह अपने हाथों पर पड़ी तो वह एकदम चमत्कृत हो गया । उस करिश्माई जल के स्पर्श से सूरसेन के हाथों का कोढ़ जाता रहा । वह प्रसन्नतापूर्वक ग्वालिपा ऋषि के पास जाकर उनके चरणों में जाकर गिर पड़ा । ग्वालिपा ऋषि ने राज करने का आर्शीवाद दिया । सूरसेन से उस गड्डे पर एक भव्य बावड़ी का निर्माण करके ग्वालियर राज्य की स्थापना की । यह ऐतिहासिक बावड़ी आज भी ग्वालियर दुर्ग में स्थित है जो ''सूरजकुंड '' के नाम से जानी जाती है ।

       ग्वालियर दुर्ग परिसर में ही एक और दुर्लभ बावड़ी स्थित है - एक पत्थर की बावड़ी ।  इस अद्भुत वास्तु कौशल से निर्मित बावड़ी का निर्माण तत्कालीन तोमर शासक डूंगरेंद्र सिंह और कीर्ति सिंह (1394-1520) ने कराया । इसकी खासियत यह है कि इसका निर्माण एक ही पत्थर पर काटकर किया गया है । तात्कालीन शासक जैन धर्मावलंबी थे लिहाजा उन्होनें इसमें भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासनस्थ प्रतिमा भी निर्मित कराई। दुर्ग परिसर में स्थित यह स्थल देशभर के जैन धर्मावलंबियों का बड़ा तीर्थ क्षेत्र है ।

       इस अंचल के लोगों के जल प्रेम का एक और किस्सा विश्व विख्यात है । यह है ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर और एक गूजरी निन्नी की प्रेम कहानी, जो इतिहास में मृगनयनी के रूप में जानी जाती है । कहा जाता है कि राजा मानसिंह तोमर शिकार के लिए राई गाँव की ओर गये । रास्ते में दो भैंसो की लड़ाई हो रही थी जिससे मार्ग अवरूध्द हो गया। यह लड़ाई देखने के लिए राजा भी खड़े हो गये । पास मे ही गाँव की कुछ कन्याएँ खड़ी थीं, जो कि गूजर समाज की थी । इनमें एक ने आगे बढ़कर भैंस का सींग पकड़कर उन्हें अलग अलग कर दिया । राजा उस गूजरी की बहादुरी और उसके अद्वितीय नैसर्गिक सौंदर्य पर मोहित हो गए । उन्होनें उसे विवाह का प्रस्ताव दिया । लेकिन निन्नी नामक इस गूजरी ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी कि वह तभी शादी करेगी जब उसके पीने के लिए सांक नदी का पानी किले में पहुँचे । राजा मानसिंह ने दुर्ग पर एक पृथक महल बनवाया जो आज भी गूजरी महल के नाम से जाना जाता है और राजा मानसिंह ने मृगनयनी नामक अपनी इस रानी को पीने के लिए सांक नदी से महल तक पानी लाने के लिए पाइप लाइन डलवाई थी किले पर उस जल संरक्षण के लिए एक बावड़ी का भी निर्माण भी कराया  था । इनके अवशेष अभी भी ग्वालियर दुर्ग के आसपास मौजूद हैं ।

ग्वालियर में मौजूद कुछ पुरातन ऐतिहासिक बावड़ियॉ :-

यूँ तो ग्वालियर शहर के हर हिस्से में बावड़ियों के अवशेष मौजूद है, जिनकी संख्या सैकड़ों में है । इनमें से अनेक नष्ट हो गई  । कुछ अतिक्रमण का शिकार हो गई और कई सिकुड़कर कुएँ में तब्दील हो गई ।ऐसी कुछ बावड़ियों की जानकारी को दो भागों में बॉटा जा सकता है :- (क) ग्वालियर दुर्ग की बावड़ियाँ और (ख) शहर में स्थित बावड़ियाँ ।

(क) ग्वालियर दुर्ग

       भारत में ऐसे कम ही ऐसे दुर्ग है जहाँ इतनी ऊँचाई पर जल प्रदाय व्यवस्था के सुचारू प्रयास किये गये हों  । यहाँ स्थित प्रमुख बावड़ियाँ इस प्रकार हैं :-

सूरजकुंड :- ग्वालियर ऋषि के कहने पर सूरजसेन ने इसको उत्तम सरोवर में तब्दील किया । माना जाता है कि इस कुंड के निर्माण से निकले पत्थरों से ही दुर्ग के लिए दीवारें बनाई गई । मातृचेट ने इसे सुधारा और पुननिर्माण कराया ।

गंगोला ताल :- दुर्ग पर ही स्थित तालनुमा इस बावड़ी का निर्माण 8 वीं सदी में किया गया । इसका नाम राजा मानसिंह कालीन गंगू भगत के नाम पर पड़ा । माना जाता है कि इससे निकले पत्थरों से तेली का मंदिर बनवाया गया ।

       ग्वालियर दुर्ग के बारे में इब्नबतूता ने जो अपना यात्रा वृतांत लिखा है कि उसके मुताबिक ''किले के अंदर काफी पानी के हौज हैं । किले की दीवार मिले हुए 20 कुएँ हैं जिनके पास ही दीवार में मजनीक और अरादे लगे हुए हैं ।' यहाँ मध्य युग में 21 कुएँ, सरोवर और बावड़ियों की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है । इनमें से जौहर ताल, तिकोनिया ताल, रानी ताल, चेरी ताल, एक खंबा ताल, कटोरा ताल, नूर सागर अभी  भी अवशेष की दशा में मौजूद हैं ।

(ख) ग्वालियर शहर

       ग्वालियर शहर में बावड़ियों की भरमार रही है । इनमें से कई का तो अब अता पता ही नहीं है । मसलन बेला की बावड़ी के नाम से ग्वालियर में एक प्रसिध्द स्थान है लेकिन वर्तमान में यहाँ कोई बावड़ी नहीं है । इतिहास में लेख है कि राजा मानसिंह ने बेला की बावड़ी का निर्माण कराया था । राजा वीर सिंह ने भी एक बावड़ी बनवाई थी जिसे कालांतर में बॉध के रूप में विकसित किया गया था । इसको हाल ही में सरकार ने पुन: विकसित किया है जो वीरपुर बाँध के नाम से जाना जाता है ।

       सिंधिया राज परिवार के शाही निवास जय विलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस, की चहारदीवारी में रहे कई किलोमीटर लंबे परिसर में, जो अब कालोनियों में तब्दील हो गई हैं में दर्जनों बावड़ियाँ जीर्ण शीर्ण हालत में मौजूद है । ग्वालियर शहर में जनकताल, सागर ताल, गजराराजा स्कूल,कमलाराजा कालेज पुराने हाईकोर्ट के पास, माधौनगर, हिरणवन, शारदा विहार, निम्बाजी की खोह में शानदार स्थापत्य वाली बावड़ियों के अवशेष अभी भी मौजूद हैं । इनमें से कुछ बावड़ियों का जीर्णोध्दार भी किया गया है जो नागरिकों के लिए पेयजल की आपूर्ति कर रही है ।यदि बाकी बावड़ियों को संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया जाए तो एक ओर तो ग्वालियर की इन ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण होगा वहीं ये ग्वालियर की पेयजल समस्या से निजात दिलाने में सहायक होंगी ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता  विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)